Sunday, 7 April 2019

मितवा

जबसे तुमने कहा हम फिर मिलेंगे
मिलके मंज़िल की तरफ चल पड़ेंगे

घड़ी घड़ी बचे दिनों को गिन रहा हूं मैं
ख्वाबों में ही आने वाले पलों को जी रहा हूं मैं

वो मंज़िल भी क्या मंज़िल जिसका सफर तेरे साथ ना हो
वो ज़िन्दगी भी क्या ज़िन्दगी जिसमें तेरे जैसा मीत ना हो

अब और ना कराओ इंतज़ार
मिलने भी आ जाओ एक बार
मितवा....... मितवा.......

तुमसे मिलके ही तो बदला हूं मैं
गहरे रिश्तों को कुछ कुछ समझा हूं में

वो रिश्ते भी क्या रिश्ते जिनमें हमारे जैसे किस्से ना हो
वो यादें भी क्या यादें जिनका रिश्ता दिल से ना हो

अब समझा हूं तुम्हीं से है खुशी
तुम भी तो समझो दिलनाशीन
मितवा....... मितवा........

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