खयालों की अपनी दुनिया में रहता है बेखबर
शिकायत है मुझे कि मुझपे पड़ती नहीं उसकी नज़र
पर मुझे पसंद है वो
जब मुझे वो जानता नहीं था, लगता था उसे तनहाई से प्यार है
जब जान गया तो लगा ,भला क्या उससे अच्छा कोई यार है?
तभी तो मुझे पसंद है वो
समझता तो है सब कुछ वो , पर दिखता है बड़ा बेफिकर
सवाल उठ जाते हैं मन में क्या मेरी है भी कुछ कदर
पर मुझे पसंद है वो
बातें कम ही करता है, हर एक की राय सुनकर मौन है
बोलता है अगर तो या तो बहुत ही ज़रूरी है या फिर दो तीन पैग डॉउन है
पर मुझे पसंद है वो
प्यार जताओ तो बेचैन सा हो जाता है जैसे प्यार की आदत न हो
प्यार की बातों को नज़रंदाज़ कर देता है कि किसी को उससे उल्फत न हो
पर मुझे पसंद है वो
आवाज़ में उसकी मिठास है , रंग भरने का, महसूस करने का अंदाज़ है
नाच में उसकी जुनूनियत और गाने में अलग अहसास है
हां मुझे पसंद है वो
बार बार उससे बातें करने की कोशिश की आदत सी हो गई है
एक बार मिलने के बाद फिर मिलने की उम्मीद जरूरत सी बन गई है
हां मुझे पसंद है वो
अल्फाजों में दिल खोलकर रख भी दिया मैंने, तो भी उससे मिलेगी सिर्फ खामोशी
ये मैं जानती हूं , और ऐसा करने की मेरे पास हिम्मत भी नहीं
बेमतलब ही सही , पर मुझे पसंद है वो
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