Saturday, 16 March 2019

आज़ादी

अलार्म की घंटी के बाद पाँच मिनट आँखें मूंदे रखने की...
वो जो घड़ी के कांटे से अनजान हो, वैसी सांसे लेने की ..
वो क्या सोचेंगे ये क्या सोचेंगे के ख्यालों से दूर रहने की..
घर के अंदर फुहारों में नहीं ,बरसात और बहारों में नाचने की...
किसी के डर से नहीं , अपने पर से उड़ने के लिए काम करने की..
अपने पसंद के खाने की, दिल भरने तक जीने की...
देर रात तक जागने की, दोस्तों से बतियाने की..
गलती के अहसास के बिना खुशियां लूटने की..
कमज़ोरी के पलों में आँसूं छुपाए बिना टूटने की..
उम्र के लिहाज़ के बिना बचकानियों की...
दस्तूर से नहीं,  फितूर से रिश्तों को निभाने की...

आखिर ये आज़ादी क्या किसी ने हमसे छीना है?
नहीं.. बस हम मानके चल रहे थे कि हमें ऐसे ही जीना है..
आंखें खोलने की देर है.. अपनी ज़िन्दगी है न गैर है। 

                                                            - गोदा रामकुमार 

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