Friday, 19 April 2019

उम्मीद

ख्वाबों के सच होने पे भरोसा अब तक करती हूं
ज़िंदा हूं मैं
हकीकत को गिनती तो कब की बेजान हो जाती

परियों की  कहानियों को अब तक मानती हूं
ज़िंदा हूं मैं
वास्तव में देखती तो कब की रूखी हो जाती

कायनात की साज़िश पे अब तक यकीन करती हूं
ज़िंदा हूं मै
असलियत पे गौर देती तो कब की टूट चुकी होती

उम्मीद से ही हर सुबह  आंखें खोलती हूं
ज़िंदा हूं मैं
जो है वो मंज़ूर होती तो कब की मिट चुकी होती

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