Tuesday, 23 April 2019

परी

ज़िन्दगी से खुशियां मांगी तो मिली नन्ही सी  एक परी
जिसे संभालना एक बहाना था असल में मैं खुद सुधरी
बेगरज़ प्यार जिसे ना आता था, बन गई मैं ममता से भरी
रूखे दिनों में अपनी मुस्कराहट से लाती खुशी की चिंगारी

वक़्त की रफ्तार का अंदाज़ मेरा कुछ कम पड़ गया
देखते ही देखते जैसे वक़्त मुझसे कहीं आगे दौड़ गया जिसकी बड़बड़ से हर शाम और हर दिन था जुड़ गया
अब उसके पास ही वक़्त नहीं , वो कुछ ऐसा मुड़ गया

जिसको कभी समझाते थे ,खुद समझने की कोशिश में हैं
कुछ दूरी ना आ जाए  बीच में कहीं, ये सोचकर गर्दिश में हैं
किसी ना किसी दिन ये होना ही था, कुदरत का उसूल है
दिमाग़ दिल को समझाके थक गया, कोशिश ये फ़िज़ूल है 

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